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योगी राज में पेपर लीक और परीक्षा-संबंधित घोटालों की कोई कमी नहीं

2017 में जब योगी आदित्यनाथ राज्य के सीएम बने तो छात्रों को उम्मीद थी कि बिना किसी कुख्यात पेपर लीक के अब से स्वतंत्र और निष्पक्ष ढंग से परीक्षाएं आयोजित की जायेंगी। पांच वर्ष बाद अब उनका दावा है कि स्थिति पहले से भी बदतर हो गई है।

परीक्षा का पर्चा लीक हो जाने और बाद में रद्द होने के बाद फिर से लीक हो जाने का मामला पूरे यूपी में एक सामान्य परिघटना बन चुकी है। यह एक ऐसी सतत समस्या बन चुकी है जो कुछ समूहों और व्यक्तियों की कुटिल करतूतों की ओर इशारा करती है जिन्हें राज्य में ‘पेपर-लीक गैंग’ के नाम से जाना जाता है, और वह सड़ांध जो राज्य सरकार की नौकरशाही और परीक्षाओं को आयोजित करने वाले संगठनों में भयानक रूप से बजबजा रही है।

जहाँ एक तरफ कई कोचिंग संस्थान हमेशा राडार में बने हुए हैं और इस बात के पुख्ता सुबूत भी हैं कि यूपीटीईटी (उत्तर प्रदेश शिक्षक पात्रता परीक्षा), सीटीईटी (केंद्रीय शिक्षक पात्रता परीक्षा) जैसी प्रमुख परीक्षाओं के पेपर लीक होने के पीछे इनका हाथ रहा है, वहीं दूसरी तरफ मौजूदा राज्य सरकार, योगी राज के तहत कानून-व्यवस्था की स्थिति में सुधार लाने का दावा करते हुए अपनी छाती पीटती रहती है, लेकिन इस प्रकार की समस्या का कोई ठोस समाधान ढूंढ पाने में विफल साबित रही है जिसने लाखों अभ्यर्थियों के समय और उर्जा को खाक में मिला दिया है।

इस संबंध में भाजपा सांसद वरुण गाँधी अपनी ही के आलोचक रहे हैं, और योगी सरकार के तहत बेरोजगारी और पेपर लीक के मुद्दे उठाते रहे हैं, ने पूछा है, “आखिर कब तक भारत के युवाओं को धैर्य से काम लेना होगा?” उन्होंने “शिक्षा माफिया को मिल रहे ‘राजनीतिक संरक्षण’ के खिलाफ कार्यवाई करने” का आह्वान किया।

विपक्ष भी यूपीटीइटी 2021 के हालिया पेपर लीक को लेकर आलोचनात्मक रुख अख्तियार किये हुए है। अखिलेश यादव ने राज्य सरकार को लताड़ लगाते हुए दावा किया है कि योगी राज के तहत पेपर लीक की घटनायें होना अब आम बात हो चुकी है।

यूपीटीईटी 2021 के हालिया पेपर लीक का विरोध विपक्ष कर रहा है। अखिलेश यादव ने राज्य सरकार को फटकार लगाते हुए दावा किया है कि योगी राज के तहत पेपर लीक होना आम बात है।

2017 में जब योगी आदित्यनाथ राज्य के मुख्यमंत्री बने तो छात्रों को उम्मीद थी कि अब बिना किसी कुख्यात पेपर लीक के स्वतंत्र और निष्पक्ष ढंग से परीक्षाएं आयोजित की जा सकेंगी। पांच साल बाद जाकर अब छात्रों का कहना है कि हालात पहले से भी बदतर हो चुके हैं। 2017 में योगी सरकार के शासन के चार महीने बाद छात्रों ने जिस पहली प्रमुख परीक्षा को रद्द होते देखा था वह यूपी पुलिस भर्ती परीक्षा थी। हालाँकि सख्त कार्यवाई और गिरफ्तारियों का सिलसिला चला, किंतु मूल मुद्दा जस का तस बना रहा और कई अन्य स्वरूपों में फिर से उभरने लगा। 2021 में आयोजित यूपीएसआई (यूपी सब-इंस्पेक्टर) परीक्षा कई विवादों में घिरी हुई है, जिसमें छात्रों ने परीक्षा आयोजित करने वाले बोर्ड के खिलाफ ही धांधली करने का आरोप लगाया है और सीबीआई जाँच की मांग की है।  

बनारस की एक उम्मीदवार अनीता कुमारी, जो कई वर्षों से सरकारी परीक्षाओं की तैयारी में जुटी हैं, नवंबर 2021 में यूपीटीईटी की परीक्षा में सम्मिलित हुईं थीं। यूपी के 75 जिलों के 20 लाख से अधिक उम्मीदवारों ने इस परीक्षा में भाग लिया था। अनीता ने कहा, “मैंने इस परीक्षा में भाग लेने के लिए लखनऊ तक की यात्रा की, और मेरा एग्जाम अच्छा रहा। लेकिन जैसे ही मैं परीक्षा केंद्र से बाहर निकली, अन्य छात्रों ने मुझे बताया कि प्रश्न पत्र तो पहले से ही लीक हो गया था।”

बुरी तरह से हताश वे अपने समय और पैसे की बर्बादी के बारे में शिकायत करते हुए कहती हैं, “मैंने अपना पैसा खर्च करके इतनी लंबी दूरी तय की थी, लेकिन अंत में देखने को मिला कि परीक्षा ही रद्द हो गई है। इसे जनवरी के लिए पुनर्निर्धारित कर दिया गया था, और मैंने फिर से इसमें भाग लिया। ऐसा कब तक चलता रहने वाला है जब मैं अपनी परीक्षा उत्तीर्ण कर एक अदद नौकरी पा सकूं?”

उन्होंने आगे कहा, “मुझे नहीं लगता कि योगी सरकार के तहत कुछ ख़ास बदलाव आया है, और पेपर लीक की घटनाएं अभी भी एक सामान्य हकीकत बनी हुई है।” एक अन्य अभ्यर्थी बंटी का कहना है कि ‘प्रश्नपत्र हल करने वाले रैकेट’ पर अंकुश लगाने की सरकार की कोशिश सिर्फ दिखावा है। बंटी ने कहा, “यह देखना दिलचस्प है कि किसी पेपर लीक की घटना के तुरंत बाद, सरकार झट से मामले की जाँच और अपराधियों की गिरफ्तारी के लिए एक एसटीएफ का गठन कर लेती है। लेकिन होता यह है कि इन रैकेटों की गिरफ्तारी और इन पर अंकुश लगाने के शोर के बाद, जिस अगले पेपर को पुनर्निर्धारित किया जाता है तो वह भी लीक हो जाता है।” वे आगे कहते हैं, “मुझे नहीं लगता कि कोई भी सुरक्षित और निष्पक्ष परीक्षाओं को आयोजित करने को लेकर गंभीर है।”

बनारस के पास गाँव फुलवरिया के रहने वाले गोपाल जिन्होंने अगस्त 2021 में यूपीटीईटी (यूपीएसएसएससी प्रारंभिक पात्रता परीक्षा) में भाग लिया था, उनका कहना है कि पेपर लीक हो गया था और पहले से ही कई छात्रों के फोन पर मौजूद था। गोपाल ने कहा, “जैसे ही मैंने अपनी परीक्षा खत्म की, मेरे दोस्तों ने मुझे दिखाया कि पूरा पेपर ऑनलाइन लीक हो गया था और उनके व्हाट्सएप्प पर दिख रहा था।” उनका आगे कहना था “इस प्रकार की घटनाओं से हम सच में इतना हताश हो चुके हैं कि दुबारा से परीक्षाओं में भाग तक नहीं लेना चाहते।” एक अन्य उम्मीदवार शिवकुमार का कहना है कि ऑफलाइन परीक्षाओं का यह हाल है, लेकिन ऑनलाइन परीक्षाओं का हाल भी इससे बेहतर नहीं हैं।

शिवकुमार ने बताया, “हम ऑनलाइन परीक्षाओं पर भी भरोसा नहीं कर सकते हैं। ऑनलाइन हैकिंग और रिमोट एक्सेस की काफी संभावनाएं बनी हुई हैं। ऐसे परीक्षा केन्द्रों को संचालित करने वाले निजी व्यक्तियों तक पहुँच बनाकर रिश्वत देकर आसनी से हासिल किया जा सकता है। यदि सरकार वास्तव में नियंत्रण को मजबूत करने की इच्छुक है तो उसे एक बेहतर ढाँचे को खड़ा करने की जरूरत है। सिर्फ पेपर लीक के लिए एसटीएफ को गठित करने से कुछ भी भला नहीं होने जा रहा है। फिर भी, सरकार को यह सुनिश्चित करने की जरूरत है कि पेपर लीक के मूल कारणों को दूर किया जाये।” यह एक गौर करने लायक प्रवृति देखने को मिल रही है; पेपर लीक के साथ यह चक्र शुरू होता है, इसके बाद एक राज्य-गठित एसटीएफ के द्वारा जांच और गिरफ्तारियां होती हैं, और इसका अंत एक और पेपर लीक या घोटाले में हो जाता है। शिवकुमार का कहना था, “सरकार यदि सच में कुछ करना चाहती है तो उसे इस प्रकार के घोटालों को अंजाम देने के पीछे के रैकेट के बारे में गहराई से यथोचित पड़ताल के लिए एक कमेटी को आदेश देना चाहिए।”

एक अन्य उम्मीदवार उत्कर्ष सिंह जिनका कहना है कि पिछले पांच वर्षों में यह एक आम बात हो गई है कि हर ऑनलाइन परीक्षा के बाद, हमें परिणामों से कहीं अधिक घोटालों और लीक के बारे में फिक्रमंद होना पड़ता है। उत्कर्ष कहते हैं, “हम इतने कठिन परिश्रम के बाद परीक्षा देते हैं; फिर हमें पता चलता है कि पेपर तो लीक हो गया है। फिर हम परीक्षा केंद्र के सामने धरना-प्रदर्शन करते हैं। फिर परीक्षा के पुनर्निर्धारण के इंतजार में टकटकी लगाये रहते हैं और फिर से तैयारियों में जुट जाते हैं। इन सबमें मेरा बहुत सा समय बर्बाद हो गया है।”

घूसखोरी एक और मुद्दा है जिसको लेकर उम्मीदवारों को लगता है कि यह उनकी कड़ी मेहनत को चौपट कर सकता है। शिवकुमार ने बताया, “किसी भी परीक्षा में कई चरण होते हैं, जिनसे गुजरना पड़ता है। किसी परीक्षा में उत्तीर्ण होने के बाद, मुझे साक्षात्कार में शामिल होना होगा, इसके बाद मेडिकल और शारीरिक टेस्ट इत्यादि की बारी आती है। इनमें से किसी भी चरण में यदि कहीं पर रिश्वत का मामला हो तो इसकी वजह से बाकी के चयनित उम्मीदवारों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।” वे आगे कहते हैं, “बहुत संभव है कि साक्षात्कारकर्ता मुझे कम अंक दे दे, या चिकित्सा परीक्षक ने मेरी यथोचित अर्जित सीट को छीनने के कोई समस्या निकाल दे।” घूसखोरी और परीक्षाओं में धांधली के प्रचलन पर आगे टिप्पणी करते हुए अरुण श्रीवास्तव, जो मुगलसराय में अपना कोचिंग सेंटर चलाते हैं, कहते हैं, “परीक्षाओं की स्थिति को देखकर मैं स्तब्ध हूँ। मेरे पर ऐसे शानदार विद्यार्थी हैं जो बड़े ही मेधावी और मेहनती हैं, लेकिन उनके सपने बिखर गए हैं।”

भले ही उनकी इच्छा इस प्रकार के घोटाले सामने आने पर विरोध में शामिल छात्रों के साथ एकजुटता में खड़े होने होती है, लेकिन चाहकर भी वे ऐसा नहीं कर पाते हैं क्योंकि उन्हें इस बात का खतरा बना रहता है कि पुलिस उनके व्यवसाय पर कार्यवाई कर सकती है। यूपी के कई जिलों में अधिकांश छोटे-छोटे कोचिंग सेंटर हैं जो पेपर लीक कराते हैं। ऐसे में कोई भी कोचिंग संस्थान राज्य के द्वारा पेपर लीक रैकेट की जांच के लिए एक स्वाभाविक निशाना बन जाता है।

घूसखोरी का प्रचलन सदियों पुरानी समस्या है। अरुण व्यंग्यात्मक लहजे में टिप्पणी करते हैं, “पहले ऐसा हुआ करता था कि किसी भी और सभी पदों के लिए एक तयशुदा रेट फिक्स रहता था। यदि आपके पास पैसा हो तो आप कुछ भी बन सकते थे।” वे आगे कहते हैं, “यदि आप चपरासी, बाबू बनना चाहते हैं तो इसके लिए कई लाख का रेट तय था। मुझे लगता है रेट का सिस्टम अभी भी प्रचलन में मौजूद है और बहुत कुछ नहीं बदला है।” जो लोग सरकारी नौकरशाही में पहुँच गए हैं या राजनीतिक रूप से कनेक्टेड हैं के बारे में अपनी टिप्पणी में अरुण कहते हैं, “नौकरी की अधिसूचना की घोषणा किये जाने से पहले ही नेता-टाइप लोग अपने रिश्तेदारों के लिए सीटों की व्यवस्था करने के काम में जुट जाते हैं। इस प्रकार 30% सीटें तो पहले से ही बिक चुकी होती हैं।”

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